Subhashitani Class 7 | सुभाषितानि – सप्तम वर्ग

Class 7 Sanskrit Subhashitani

Here are the NCERT class 7 Sanskrit subhashitani with their Hindi and English meanings (literal and essence). The intention is to help everyone who wants to benefit from these timeless & priceless jewels by understanding and imbibing the wisdom lying therein. Students of class 7, CBSE board will find an extra advantage as these shlokas are part of their syllabus.

एनसीईआरटी कक्षा 7 के संस्कृत सुभाषितानि हिंदी और अंग्रेजी अर्थ (शब्दार्थ और भावार्थ) के साथ प्रस्तुत हैं। लक्ष्य उन सभी की मदद करना है जो इन कालातीत और अमूल्य रत्नों में निहित ज्ञान को समझकर और आत्मसात करके उनसे लाभ उठाना चाहते हैं। सीबीएसई बोर्ड के कक्षा 7 के छात्रों को अतिरिक्त लाभ मिलेगा क्योंकि ये श्लोक उनके पाठ्यक्रम का हिस्सा हैं।

पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि जलमन्नं सुभाषितम्। मूढैः पाषाणखण्डेषु रत्नसंज्ञा विधीयते।।

प्रश्न: ‘पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि‘ सुभाषितम् का अर्थ क्या है?

उत्तर: आइए, इस सुभाषितम् के शाब्दिक अर्थ के साथ-साथ अभिप्राय को भी देखें।

प्रथम चरण – पाठ

पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि जलमन्नं सुभाषितम्।

मूढैः पाषाणखण्डेषु रत्नसंज्ञा विधीयते।।

द्वितीय चरण – पदच्छेद

पृथिव्याम्, त्रीणि, रत्नानि, जलम्, अन्नम्, सुभाषितम्, मूढैः, पाषाणखण्डेषु, रत्नसंज्ञा, विधीयते।

तृतीय चरण – अन्वय

जलम् अन्नं सुभाषितम् (इति) पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि (सन्ति)। मूढैः पाषाणखण्डेषु रत्नसंज्ञा विधीयते।

चतुर्थ चरण – शब्दार्थ

धरती पर पानी, भोजन और हितकारी वचन ये तीन रत्न (बहुमूल्य) हैं। मूर्खों द्वारा ही पत्थर के टुकड़ों में रत्न नाम की संकल्पना की जाती है। (मूर्ख लोग पत्थर के टुकड़ों को रत्न कहते हैं।

पंचम चरण – भावार्थ / तात्पर्य

रत्न से तात्पर्य बहुमूल्य वस्तु से है। पत्थर के रत्नों, जैसे हीरा, मोती, पुखराज, पन्ना, माणिक आदि को लोग बहुमूल्य समझ कर इन्हें पाने और संभाल कर रखने का पुरुषार्थ करते हैं। चाणक्य ऐसे लोगों को मूर्ख बताते हैं। उनका मानना है कि धरती पर वास्तविक रत्न तो तीन ही हैं – जल, भोजन एवं ज्ञान की हितकारी बातें। इनसे ही हमारा जीवन सार्थक होता है। जल एवं अन्न के बिना हमारा शरीर जीवित नहीं रह सकता। ऐसे ही ज्ञान के बिना हमारा जीवन दिशाविहीन एवं उद्देश्यहीन हो जाता है। वस्तुतः हमें इन्हें ही रत्न समझना चाहिए।  

जल, अन्न एवं ज्ञान ≡ रत्न;             कीमती पत्थर ≠ रत्न

प्रश्न: पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि सुभाषित के रचयिता कौन हैं?

उत्तर: आचार्य चाणक्य ने ‘पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि’ की रचना की है।

प्रश्न: पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि सुभाषित किस ग्रन्थ से है?        

उत्तर: ‘पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि’ सुभाषित ‘चाणक्यनीति’ पुस्तक से है।

Question: What is the meaning of the subhashitam ‘Prithivyam treeni ratnani’?

Answer: Let’s see the literal meaning as well as the intentional meaning of this subhashitam.

Step 1) Recitation:

pṛthivyāṃ trīṇi ratnāni jalamannaṃ subhāṣitam।

mūḍhaiḥ pāṣāṇakhaṇḍeṣu ratnasaṃjñā vidhīyate।।

Step 2) Words separation:

pṛthivyāṃ, trīṇi, ratnāni, jalaṃ, annaṃ, subhāṣitaṃ, mūḍhaiḥ, pāṣāṇakhaṇḍeṣu, ratnasaṃjñā, vidhīyate. 

Step 3) Words rearrangement in prose order:

Jalaṃ annaṃ subhāṣitaṃ (iti) pṛthivyāṃ trīṇi ratnāni (santi), mūḍhaiḥ pāṣāṇakhaṇḍeṣu ratnasaṃjñā vidhīyate.

Step 4) Literal meaning:

Water, food and beneficial words are the three gems (precious) on earth. Only fools think of pieces of stone as gems.

Step 5) Intentional meaning:

Gem means precious thing. People consider stone gems like diamonds, pearls, topaz, emeralds, rubies ​​etc. as precious and make efforts to get them and preserve them. Chanakya calls such people fools. He believes that there are only three real gems on earth – water, food and knowledge.

It is only through these that our life becomes meaningful. Our bodies cannot survive without water and food. Without such knowledge, our life becomes directionless and purposeless. We should consider these as gems.

Water, food and knowledge ≡ gems;              precious stone ≠ gem

Question: Who is the author of ‘Prithivyam treeni ratnani’?

Answer: Acharya Chanakya wrote ‘Prithivyam treeni ratnani’.

Question: Which book is ‘Prithivyam treeni ratnani’ from?

Answer: ‘Chanakyaneeti’.

सत्येन धार्यते पृथ्वी सत्येन तपते रविः। सत्येन वाति वायुश्च सर्वं सत्ये प्रतिष्ठितम्।।

प्रश्न: ‘सत्येन धार्यते पृथ्वी‘ सुभाषितम् का अर्थ क्या है?

उत्तर: आइए, इस सुभाषितम् के शाब्दिक अर्थ के साथ-साथ अभिप्राय को भी देखें।

प्रथम चरण – पाठ

सत्येन धार्यते पृथ्वी सत्येन तपते रविः।

सत्येन वाति वायुश्च सर्वं सत्ये प्रतिष्ठितम्।।

द्वितीय चरण – पदच्छेद

सत्येन, धार्यते, पृथ्वी, सत्येन, तपते, रविः, सत्येन, वाति, वायुः, च, सर्वम्, सत्ये, प्रतिष्ठितम्।

तृतीय चरण – अन्वय

पृथ्वी सत्येन धार्यते, रविः सत्येन तपते, वायुः सत्येन वाति च, सर्वं सत्ये प्रतिष्ठितं (भवति)।

चतुर्थ चरण – शब्दार्थ

धरती सत्य द्वारा धारण करती है, सूर्य सत्य द्वारा जलता है और वायु सत्य द्वारा बहती है, सब कुछ सत्य पर ही टिका हुआ है।

पंचम चरण – भावार्थ / तात्पर्य

सुभाषित में सत्य की शक्ति बताई गयी है। संसार का अस्तित्व सत्य पर ही आधारित है। धरती के पास वस्तुओं को धारण करने की शक्ति सत्य से आती है। सूर्य सत्य के बल से ही प्रकाश एवं ऊष्मा की ऊर्जा फैलाता है। हवा भी सत्य की शक्ति से ही बहती है।  

सच्चा व्यक्ति अंदर से निर्भय और साहसी होता है। जबकि असत्य के मार्ग पर चलने वाला अंदर से कमजोर हो जाता है और वह लोगों का विश्वास भी खो देता है।

प्रश्न: सत्येन धार्यते पृथ्वी सुभाषित के रचयिता कौन हैं?

उत्तर: आचार्य चाणक्य ने ‘सत्येन धार्यते पृथ्वी’ की रचना की है।

प्रश्न: सत्येन धार्यते पृथ्वी सुभाषित किस ग्रन्थ से है?   

उत्तर: ‘सत्येन धार्यते पृथ्वी’ सुभाषित ‘चाणक्यनीति’ पुस्तक से है।

Question: What is the meaning of the subhashitam ‘Satyena dhaaryate Prithvi’?

Answer: Let’s see the literal meaning as well as the intentional meaning of this subhashitam.

Step 1) Recitation:

satyena dhāryate pṛthvī satyena tapate raviḥ।

satyena vāti vāyuśca sarvaṃ satye pratiṣṭhitam।।

Step 2) Words separation:

satyena, dhāryate, pṛthvī, satyena, tapate, raviḥ, satyena, vāti, vāyuḥ, ca, sarvam, satye, pratiṣṭhitam.

Step 3) Words rearrangement in prose order:

pṛthvī satyena dhāryate, raviḥ satyena tapate, vāyuḥ satyena vāti ca, sarvaṃ satye pratiṣṭhitaṃ (bhavati).

Step 4) Literal meaning:

The earth bears on truth, the sun burns on truth and the wind blows on truth. Everything rests on truth.

Step 5) Intentional meaning:

The power of truth has been explained in the Subhashita. The world’s existence is based on truth alone. The power to hold things on earth comes from truth. The Sun spreads the energy of light and heat only with the power of truth. Even the wind blows with the power of truth.

A true person is fearless and courageous; whereas the one who follows the path of untruth becomes weak from within and he also loses the trust of people.

Question: Who is the author of ‘Satyena dhaaryate Prithvi’?

Answer: Acharya Chanakya wrote ‘Prithivyam treeni ratnani’.

Question: Which book is ‘Satyena dhaaryate Prithvi’ from?

Answer: ‘Chanakyaneeti’.

दाने तपसि शौर्ये च विज्ञाने विनये नये। विस्मयो न हि कर्त्तव्यो बहुरत्ना वसुन्धरा।।

प्रश्न: ‘दाने तपसि शौर्ये‘ सुभाषितम् का अर्थ क्या है?

उत्तर: आइए, इस सुभाषितम् के शाब्दिक अर्थ के साथ-साथ अभिप्राय को भी देखें।

प्रथम चरण – पाठ

दाने तपसि शौर्ये च विज्ञाने विनये नये।

विस्मयो न हि कर्त्तव्यो बहुरत्ना वसुन्धरा।।

द्वितीय चरण – पदच्छेद

दाने, तपसि, शौर्ये, च, विज्ञाने, विनये, नये, विस्मयः, न, हि, कर्त्तव्यः, बहुरत्ना, वसुन्धरा।

तृतीय चरण – अन्वय

दाने तपसि शौर्ये विज्ञाने विनये नये च विस्मयः न हि कर्त्तव्यः (यत्) वसुन्धरा बहुरत्ना (अस्ति)।

चतुर्थ चरण – शब्दार्थ

दान में, तप में, वीरता में, विशेष ज्ञान में, नम्रता में और नीति में आश्चर्य नहीं करना चाहिए। यह पृथ्वी अनेक रत्नों वाली है।

पंचम चरण – भावार्थ / तात्पर्य

दान, तपस्या, वीरता, विशेष ज्ञान, विनम्रता और नीतिवान होने में मनुष्य को आश्चर्य (सबसे बड़ा होने का अभिमान) नहीं करना चाहिए क्योंकि यह पृथ्वी अनेक अमूल्य रत्नों (गुणी लोगों) से भरी हुई है।

प्रश्न: ‘दाने तपसि शौर्ये’ सुभाषित के रचयिता कौन हैं?

उत्तर: आचार्य चाणक्य ने ‘दाने तपसि शौर्ये’ की रचना की है।

प्रश्न: दाने तपसि शौर्ये सुभाषित किस ग्रन्थ से है?      

उत्तर: ‘सत्येन धार्यते पृथ्वी’ सुभाषित ‘चाणक्यनीति’ पुस्तक से है।

Question: What is the meaning of the subhashitam ‘Daane tapasi shaurye’?

Answer: Let’s see the literal meaning as well as the intentional meaning of this subhashitam.

Step 1) Recitation:

dāne tapasi śaurye ca vijñāne vinaye naye|

vismayo na hi karttavyo bahuratnā vasundharā||

Step 2) Words separation:

dāne, tapasi, śaurye, ca, vijñāne, vinaye, naye, vismayaḥ, na, hi, karttavyaḥ, bahuratnā, vasundharā.

Step 3) Words rearrangement in prose order:

dāne tapasi śaurye vijñāne vinaye naye ca vismayaḥ na hi karttavyaḥ (yat) vasundharā bahuratnā (asti).

Step 4) Literal meaning:

One should not be surprised at charity, penance, bravery, special knowledge, humility and ethics. This earth is full of many gems.

Step 5) Intentional meaning:

One should not be surprised (proud to be the greatest) in charity, penance, bravery, special knowledge, humility and ethical behaviour because the earth is full of many priceless gems (virtuous people).

Question: Who is the author of ‘Daane tapasi shaurye’?

Answer: Acharya Chanakya wrote ‘Prithivyam treeni ratnani’.

Question: Which book is ‘Daane tapasi shaurye’ from?

Answer: ‘Chanakyaneeti’.

सद्भिरेव सहासीत सद्भिः कुर्वीत सङ्गतिम्। सद्भिर्विवादं मैत्रीं च नासद्भिः किञ्चिदाचरेत्।।

प्रश्न: ‘सद्भिरेव सहासीत‘ सुभाषितम् का क्या अर्थ है?

उत्तर: आइए, इस सुभाषितम् के शाब्दिक अर्थ के साथ-साथ अभिप्राय को भी देखें।

प्रथम चरण – पाठ

सद्भिरेव सहासीत सद्भिः कुर्वीत सङ्गतिम्।

सद्भिर्विवादं मैत्रीं च नासद्भिः किञ्चिदाचरेत्।।

द्वितीय चरण – पदच्छेद

सद्भिः, एव, सह, आसीत, सद्भिः, कुर्वीत, सङ्गतिम्, सद्भिः, विवादम्, मैत्रीं, च, न, असद्भिः, किञ्चित्, आचरेत्।

तृतीय चरण – अन्वय

सद्भिः सह आसीत, सद्भिः एव (सह) सङ्गतिं विवादं मैत्रीं च कुर्वीत। असद्भिः (सह) किञ्चित् न आचरेत्।

चतुर्थ चरण – शब्दार्थ

सज्जनों के साथ बैठना चाहिए, सज्जनों के साथ ही प्रेम, वादविवाद और मित्रता करनी चाहिए। दुर्जनों के साथ कुछ भी व्यवहार नहीं करना चाहिए।

पंचम चरण – भावार्थ / तात्पर्य

संगति का हमारे ऊपर बहुत गहरा प्रभाव पड़ता है। हम जैसे व्यक्तियों के साथ उठते-बैठते या व्यवहार करते हैं वैसा ही स्वयं भी बन जाते हैं। इसलिए हमें अच्छे लोगों  के साथ ही बैठना चाहिए। उनके साथ ही मित्रता एवं प्रेम करना चाहिए। यहाँ तक कि मतभेद या विवाद करना हो तो उनके साथ ही करना चाहिए। जो अच्छे व्यक्ति नहीं हैं उनके प्रति उदासीन रहना चाहिए।   

प्रश्न: सद्भिरेव सहासीत सुभाषित किस पुस्तक से है?

उत्तर: ‘सद्भिरेव सहासीत’ सुभाषित ‘सुभाषितरत्नभाण्डागारम्’ पुस्तक से है।

Question: What is the meaning of the subhashitam ‘Sadbhireva sahaseeta’?

Answer: Let’s see the literal meaning as well as the essence of this subhashitam.

Step 1) Recitation:

sadbhireva sahāsīta sadbhiḥ kurvīta saṅgatim।

sadbhirvivādaṃ maitrīṃ ca nāsadbhiḥ kiñcidācaret।।

Step 2) Words separation:

sadbhiḥ, eva, saha, āsīta, sadbhiḥ, kurvīta, saṅgatim, sadbhiḥ, vivādam, maitrīṃ, ca, na, asadbhiḥ, kiñcit, ācaret.

Step 3) Words rearrangement in prose order:

sadbhiḥ saha āsīta, sadbhiḥ eva (saha) saṅgatiṃ vivādaṃ maitrīṃ ca kurvīta| asadbhiḥ (saha) kiñcit na ācaret.

Step 4) Literal meaning:

One should sit with gentlemen, love, debate and befriend only gentlemen. One should not have anything to do with wicked people.

Step 5) Essence:

Our company has a deep impact on us. We become like the people we interact with. Therefore we should sit only with good people. One should have friendship and love with them only. Even if there is a difference of opinion or dispute, it should be done only with them. We should stay indifferent towards those who are not good people.

Question: Which book is ‘Sadbhireva sahaseeta’ from?

Answer: ‘Subhashita Ratna Bhaandaagaaram’.

धनधान्यप्रयोगेषु विद्यायाः संग्रहेषु च। आहारे व्यवहारे च त्यक्तलज्जः सुखी भवेत्।।

प्रश्न: ‘धनधान्यप्रयोगेषु‘ सुभाषितम् का क्या अर्थ है?

उत्तर: आइए, इस सुभाषितम् के शाब्दिक अर्थ के साथ-साथ अभिप्राय को भी देखें।

प्रथम चरण – पाठ

धनधान्यप्रयोगेषु विद्यायाः संग्रहेषु च।

आहारे व्यवहारे च त्यक्तलज्जः सुखी भवेत्।।

द्वितीय चरण – पदच्छेद

आवश्यकता नास्ति।

तृतीय चरण – अन्वय            

धनधान्यप्रयोगेषु विद्यायाः संग्रहेषु आहारे व्यवहारे च त्यक्तलज्जः सुखी भवेत्।

चतुर्थ चरण – शब्दार्थ

धनधान्य के प्रयोग में, विद्या संग्रह करने में एवं आहार-व्यवहार में संकोच छोड़ने वाला सुखी होता है।

पंचम चरण – भावार्थ / तात्पर्य

संकोच या लज्जा के कारण व्यक्ति सुख से वंचित रह जाता है। धनधान्य के प्रयोग में संकोच करने वाले को कंजूस कहा जाता है। कंजूस व्यक्ति धन का सदुपयोग एवं व्यय न करने के कारण सुख से वंचित रह जाता है।

ज्ञान अर्जित करने में संकोच करने वाला अज्ञानी रह जाता है। वह ज्ञान से प्राप्त होने वाले सुख से वंचित रह जाता है।  

ऐसे ही खाने-पीने एवं आपसी लेनदेन में संकोच करने वाला स्वयं को अपूर्ण रखता है। इसलिए इन सभी बातों में निस्संकोच व निर्लज्ज रहना चाहिए, तभी व्यक्ति सुखी रह सकता है। 

प्रश्न: ‘धनधान्यप्रयोगेषु’ सुभाषित के रचयिता कौन हैं?

उत्तर: आचार्य चाणक्य ने ‘धनधान्यप्रयोगेषु’ की रचना की है।

प्रश्न: धनधान्यप्रयोगेषु सुभाषित किस ग्रन्थ से है?      

उत्तर: ‘धनधान्यप्रयोगेषु’ सुभाषित ‘चाणक्यनीति’ पुस्तक से है।

Question: What is the meaning of the subhashitam ‘Dhanadhaanya prayogeshu’?

Answer: Let’s see the literal meaning as well as the essence of this subhashitam.

Step 1) Recitation:

dhanadhānyaprayogeṣu vidyāyāḥ saṃgraheṣu ca।

āhāre vyavahāre ca tyaktalajjaḥ sukhī bhavet।।

Step 2) Words separation:

No need.                 

Step 3) Words rearrangement in prose order:

dhanadhānyaprayogeṣu vidyāyāḥ saṃgraheṣu āhāre vyavahāre ca tyaktalajjaḥ sukhī bhavet.

Step 4) Literal meaning:

The one who gives up hesitation in the use of wealth, in accumulating knowledge and in his diet and behaviour is happy.

Step 5) Essence:

Due to hesitation or shyness, a person remains deprived of happiness. The one who hesitates in using wealth is called miser. Such a person is deprived of happiness because he does not utilize and spend his money properly.

The one who hesitates in acquiring knowledge remains ignorant. He is deprived of the happiness derived from knowledge.

Similarly, the one who hesitates in eating, drinking and mutual transactions keeps himself unfulfilled. Therefore, one should remain fearless and shameless in all these things, only then a person can remain happy.

Question: Who is the author of ‘Dhanadhaanya prayogeshu’?

Answer: Acharya Chanakya wrote ‘Prithivyam treeni ratnani’.

Question: Which book is ‘Dhanadhaanya prayogeshu’ from?

Answer: ‘Chanakyaneeti’.

क्षमावशीकृतिर्लोके क्षमया किं न साध्यते। शान्तिखड्गः करे यस्य किं करिष्यति दुर्जनः।।

प्रश्न: ‘क्षमावशीकृतिर्लोके’ सुभाषितम् का क्या अर्थ है?

उत्तर: आइए, इस सुभाषितम् के शाब्दिक अर्थ के साथ-साथ अभिप्राय को भी देखें।

प्रथम चरण – पाठ

क्षमावशीकृतिर्लोके क्षमया किं न साध्यते।

शान्तिखड्गः करे यस्य किं करिष्यति दुर्जनः।। 

द्वितीय चरण – पदच्छेद

क्षमा, वशीकृतिः, लोके, क्षमया, किम्, न, साध्यते, शान्तिखड्गः, करे, यस्य, किम्, करिष्यति, दुर्जनः।

तृतीय चरण – अन्वय            

लोके क्षमा वशीकृतिः (अस्ति)। क्षमया किं न साध्यते? यस्य करे शान्तिखड्गः (अस्ति) (तं) दुर्जनः किं करिष्यति?

चतुर्थ चरण – शब्दार्थ

संसार में क्षमा (सबसे बड़ा) वशीकरण है। क्षमा से क्या नहीं कर सकते? जिसके हाथ में क्षमा रुपी तलवार है, दुष्ट व्यक्ति उसे क्या हानि पहुंचा सकता है?

पंचम चरण – भावार्थ / तात्पर्य

क्रोध से व्यक्ति अपना व दूसरों का हानि कर बैठता है। इसके विपरीत क्षमा का गुण धारण करने से व्यक्ति सामने वाले का ह्रदय जीत लेता है। जो क्षमाशील है, क्रोध व बदले की भावना से मुक्त है वह शान्ति की शक्ति से जो चाहे वही प्राप्त कर सकता है। क्षमा एक अदृश्य शस्त्र है। जिसके पास क्षमा रुपी तलवार है उसका दुष्ट व्यक्ति कुछ बिगाड़ नहीं सकता। 

प्रश्न: ‘क्षमावशीकृतिर्लोके’ सुभाषित किस पुस्तक से है?           

उत्तर: ‘क्षमावशीकृतिर्लोके’ सुभाषित ‘सुभाषितरत्नभाण्डागारम्’ पुस्तक से है।

Question: What is the meaning of the subhashitam ‘Kshama vasheekritir loke’?

Answer: Let’s see the literal meaning as well as the essence of this subhashitam.

Step 1) Recitation:

kṣamāvaśīkṛtirloke kṣamayā kiṃ na sādhyate।

śāntikhaḍgaḥ kare yasya kiṃ kariṣyati durjanaḥ।।

Step 2) Words separation:

kṣamā, vaśīkṛtiḥ, loke, kṣamayā, kim, na, sādhyate, śāntikhaḍgaḥ, kare, yasya, kim, kariṣyati, durjanaḥ.                                 

Step 3) Words rearrangement in prose order:

loke kṣamā vaśīkṛtiḥ (asti). kṣamayā kim na sādhyate? yasya kare śāntikhaḍgaḥ (asti) (taṃ) durjanaḥ kiṃ kariṣyati?

Step 4) Literal meaning:

Forgiveness is the (biggest) tool for winning over in the world. What can’t you do with forgiveness? What harm can an evil person do to the one who has the sword of forgiveness in his hand?

Step 5) Essence:

A person in anger causes harm to himself and others. On the contrary, by adopting the quality of forgiveness, a person wins others’ hearts. One who is forgiving, free from anger and revenge can achieve whatever he wants with the power of peace. Forgiveness is an invisible weapon. An evil person cannot do any harm to the one who has the sword of forgiveness.

Question: Which book is ‘Kshama vasheekritir loke’ from?

Answer: ‘Subhashita Ratna Bhaandaagaaram’.

Author

  • Deep

    Deep is a Sanskrit learner and teacher. He has done his Engineering graduation from IIT Kanpur. He worked in the Information Technology sector serving Investment banks for ten years. He served as a Counsellor, Life Coach and Teacher, post his corporate career. Deep pursued the study of scriptures in search of the hidden treasures of valuable knowledge shared by the Rishis. In the process, he realized the need to learn Sanskrit. He, therefore, learned Sanskrit through self-study and Certification courses. Presently he spends a good chunk of his time sharing his Sanskrit knowledge.

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